translation

किताब मनुष्य को बड़ी हस्ती बना सकती है


किताब मनुष्य को बड़ी हस्ती बना सकती है

किताबों का अविश्वसनीय विशाल जखीरा, किसी उत्साही और उत्सुक पाठक को बहका देने लायक चयन की व्यापकता और समान सोच वाले व्यक्तियों से मेल-मिलाप- विश्व पुस्तक
मेले के ये कुछ असाधारण आकर्षण हैं। इसका अनुभव करने के लिए आपको स्वयं यहां आना चाहिए!

एनबीटी विश्व पुस्तक मेला 2018 ब्लॉग: सातवां दिन- शुक्रवार, 12 जनवरी, 2018
संजय वी शाह की कलम से

पढ़ना एक ऐसा शौक है जो अकेलेपन को उत्सव में बदल देता है। किताब साथ रखने वाला व्यक्ति कभी ऊब नहीं सकता। विश्व पुस्तक मेला 2018 ऐसा ही एक अवसर है जो शब्दों और विचारों का जश्न मनाता है। घुमक्कड़ी करने के लिए सैकड़ों स्टालों से सजा, हजारों पुस्तकों में से पसंदीदा चयन का विकल्प उपलब्ध कराने वाला और अविस्मरणीय यादें साथ ले जाने की सौगात देने वाला नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया द्वारा
आयोजित यह मेला विलक्षण है।

सातवां दिन अभी पूरा हुआ। अब मात्र दो दिन बचे हैं, और सौभाग्य से हमेशा की तरह ये दिन सप्ताहांत में पड़ रहे हैं। इसलिए जो पढ़ने के शौकीन हैं या पढ़ने का शौक अभी पैदा करना ही चाहते हैं, उन्हें अभी के अभी मेले में आना चाहिए। मुझे तीन साल पहले की अपनी पहली मेला-यात्रा याद है, जब मैं एक भागीदार की हैसियत से नहीं बल्कि एक पाठक के तौर पर यहां पहुंचा था। उससे पहले मैंने इतने विशाल पैमाने का
कोई पुस्तक मेला नहीं देखा था। जिस क्षण मैं प्रगति मैदान में दाखिल हुआ, उसी क्षण मेरा मस्तिष्क सुन्न पड़ गया। मैं स्तब्ध और आश्चर्यचकित था क्योंकि मुझे लगभग हर उस विषय से संबंधित पुस्तकें दस्तयाब हो गईं जिनकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। इस प्रकार मैंने स्टाल-दर- स्टाल कूद-फांद शुरू की और अपनी पसंदीदा पुस्तकें खरीदता रहा।

शाम होते-होते मेरे पास पुस्तकों से भरे विभिन्न आकार-प्रकार के 20-25 थैले जमा हो गए। उस वक्त तक मैंने इस पर विचार भी नहीं किया था कि इन थैलों को मुंबई तक आखिर मैं किस विधि ले जाऊंगा। दरअसल उन तमाम थैलों के साथ प्रगति मैदान में घूमना-फिरना तक दुश्वार हो गया था। ऐसे में पहला काम मैंने यह किया कि एक स्टाल धारक से उसके स्टाल में अपने तमाम थैले टिका देने की अनुमति मांगी। उसने मुझ पर कृपा की और तमाम चिंताओं से मुक्ति दिला दी। उसके बाद तो मैंने कुछ और पुस्तकें खरीद डालीं। पुस्तक प्रेमियों को विभिन्न स्टाल धारक दर्जनों पुस्तकें मुफ्त में भी बांट रहे थे। मैंने भी अपनी अभिरुचि की ऐसी कुछ पुस्तकें हथिया लीं। आखिरकार कौन भला पाठक ऐसा नहीं करना चाहेगा?

आखिरकार जब मैं अपने होटल पहुंचा और अपनी जमा की गई पुस्तकों के ढेर पर निगाह डाली तो मेरे होश फाख्ता हो गए! हवाई जहाज में उन पुस्तकों को उठा कर ले जाना असंभव जान पड़ा। स्टालों की सैर के दौरान जुटाए गए साहित्य का एक बड़ा हिस्सा मुझे छंटनी करना पड़ा। कुछ किताबें तो मुझे भारी मन से त्यागनी भी पड़ीं... और मैं मैग्जिमम सिटी लौट आया, लेकिन इस दृढ़ संकल्प के साथ कि अगले वर्ष डब्ल्यूबीएफ में एक भागीदार के तौर पर ही लौटूंगा।

मैंगरोल मल्टीमीडिया का इस आयोजन में भाग लेने का यह द्वितीय वर्ष है। हमने यहां अनेक सम्पर्क बनाए हैं, कई नए विचार और पाठकों के सामने अनोखे ढंग से सामग्री प्रस्तुत करने के अभिनव तरीके खोजे हैं। यद्यपि हम कोई पूर्णकालिक प्रकाशक नहीं हैं, फिर भी अपने ग्राहकों के लिए पुस्तकें प्रकाशित करते हैं और प्रतिदिन विशाल पैमाने पर कंटेंट तैयार करते हैं। यह कंटेंट प्रिंट में नहीं बल्कि ई-फॉर्मैट में होता है ताकि ज्ञान साझा करने के महायज्ञ में हम भी अपनी आहुति दे सकें।

हमारे स्टाल पर आज का दिन सर्वोत्तम रहा! हालांकि आगंतुकों की संख्या उम्मीद से कम रही। आखिरकार आगंतुकों की गुणवत्ता मायने रखती है, उनकी तादाद नहीं। हमें पूरा भरोसा है कि जिन चंद लोगों से हम यहां मिले हैं उनका हमारा साथ लंबा चलेगा। तेज गति से विकसित हो रही एक मल्टीमीडिया कंपनी होने के नाते कई अरमानों और अनुमानों की योजनाओं के बूते हम डब्ल्यूबीएफ 2018 से अधिकतम लाभ उठाने के लिए कृतसंकल्पित हैं।

एक बात और, हम लेखकों, अनुवादकों, दुभाषियों, ग्रैफिक डिजाइनरों, वेब समाधान प्रदाताओं, भाषाविदों, पत्रकारों, संपादकों और उन तमाम लोगों से मिलने में रुचि रखते हैं जो इस क्षेत्र से संबंधित हैं। कृपया हमारे स्टाल पर तशरीफ लाएं! आपके साथ चाय का प्याला खनकाते हुए हमें प्रसन्नता होगी। वहां हम हर उस चीज और विषय पर बातचीत करेंगे जो साथ-साथ विकसित होने में हमारी-आपकी मददगार सिद्ध हो।

तो मिलते हैं हमारे स्टाल पर: एनबीटी के डब्ल्यूबीएफ 2018 में मैंगरोल मल्टीमीडिया: हाल 12, स्टाल 151

(संजय वी शाह मैंगरोल मल्टीमीडिया के संस्थापक-सीईओ हैं)

Comments